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Wednesday, December 16, 2009

खामोशियाँ!

इन खामोशियों में मेरी
आवाज़ का वजूद खोया,
कहाँसे लाऊँ ऐसी खुशियाँ,
ग़म की परतों में दबी पडीं,
हरेक खुशीने अपना
वजूद इस तरह खोया,
लमहात पीछे छोड़,
वक़्त आगे निकाल गया!

Tuesday, November 17, 2009

खोयीसी बिरहन...

खोयीसी बिरहन जब
उस ऊँचे टीलेपे
सूने महल के नीचे
या फिर खंडहर के पीछे
गीत मिलन के गाती है,
पत्थर दिल रूह भी
फूट फूट के रोती है।
हर वफ़ा शर्माती है
जब गीत वफ़ाके सुनती है।
खेतोमे,खालिहानोमे
अंधेरोंमे याकि
चांदनी रातोमे
सूखे तालाब के परे
या नदियाकी मौजोंपे
कभी जंगल पहाडोंमे
मीलों फैले रेगिस्तानोमे
या सागरकी लहरोंपे
जब उसकी आवाज़
लहराती है,
हर लेहेर थम जाती है
बिजलियाँ बदरीमे
छुप जाती हैं
हर तरफ खामोशी ही
खामोशी सुनायी देती है।
मेरी दादी कहती है
सुनी थी ये आवाजें
उनकीभी दादीने॥

Friday, August 28, 2009

बिरहन

खोयीसी बिरहन जब
उस ऊँचे टीलेपे
सूने महल के नीचे
या फिर खंडहर के पीछे
गीत मिलन के गाती है,
पत्थर दिल रूह भी
फूट फूट के रोती है।
हर वफ़ा शर्माती है,
जब गीत वफ़ाके सुनती है....

खेतोमे,खालिहानोमे,
अंधेरोंमे याकि,
चाँदनी रातों में ,
सूखे तालाब के परे,
या नदियाकी मौजोंपे
कभी जंगल पहाडोंमे.....

मीलों फैले रेगिस्तानोमे
या सागरकी लहरोंपे
जब उसकी आवाज़
लहराती है,
हर लेहेर थम जाती है,
बिजलियाँ बदरीमे
छुप जाती हैं.....

हर तरफ खामोशी ही
खामोशी सुनायी देती है।
मेरी दादी कहती है
सुनी थी ये आवाज़ें,
उनकीभी दादीने...