शमा जी बहुत दिन बाद इधर आ पाया । आपकी टिप्पणिया अच्छी लगती हैं । आपसे कोई अप्रसन्न हो नही सकता । इतनी सहजता और सरलता बड़ी तपस्या से मिलती है । आपके झूठ वाला संस्मरण रोचक भी है और प्रेरणास्पद भी ,हम भी खूब हँसे आपकी उस स्थिति की कल्पना करके । एक और पुरानी लिखी गजल आपको पढ़ते हुए याद आयी । शायद अच्छी लगे ।
शमा जी
बहुत दिन बाद इधर आ पाया । आपकी टिप्पणिया अच्छी लगती हैं । आपसे कोई अप्रसन्न हो नही सकता । इतनी सहजता और सरलता बड़ी तपस्या से मिलती है । आपके झूठ वाला संस्मरण रोचक भी है और प्रेरणास्पद भी ,हम भी खूब हँसे आपकी उस स्थिति की कल्पना करके । एक और पुरानी लिखी गजल आपको पढ़ते हुए याद आयी । शायद अच्छी लगे ।
जख्म न छेड़े आँसू हैं बेताब छलकने लगते हैं
सूखे फूल किताबों में ही रख्खे अच्छे लगते हैं
दरिया ऐ गम इन आंखों से किसने बहते देखा है
बड़ी उम्र वाले भी दुःख में मासूम से बच्चे लगते हैं
वक्त नहीं मिलता यारों को जीवन के जंजालों से
वे सच्चे होकर हंसते हैं तो कितने अच्छे लगते हैं
नही चाहिए किसी की दौलत न कोई दे पाया है
प्यार के दो बोल अय गर्दूं कितने मीठे लगते हैं
बिना इबादत इमारतें सब मन्दिर मस्जिद गुरूद्वारे
जिनको नूर ऐ खुदा मिला उनको सब एक ही लगते हैं