Saturday, September 11, 2010

कहकशां यानि आकाशगंगा! By 'Ktheleo'

ऐ खुदा,

हर ज़मीं को एक आस्मां देता क्यूं है?
उम्मीद को फ़िर से परवाज़ की ज़ेहमत!  
नाउम्मीदी की आखिरी मन्ज़िल है वो।

हर आस्मां को कहकशां देता क्यूं है?
आशियानों के लिये क्या ज़मीं कम है?
आकाशगंगा के पार से ही तो लिखी जाती है, 
कभी न बदलने वाली किस्मतें!

दर्द को तू ज़ुबां देता क्यूं है?
कितना आसान है खामोशी से उसे बर्दाश्त करना,
अनकहे किस्सों को बयां देता क्यूं है?
किस्से गम-ओ- रुसवाई का सबब होते है|


क्या ज़रूरत है,
तेरे इस तमाम ताम झाम की?

ज़िन्दगी! 

बच्चे की मुस्कान की तरह

बेसबब!!

और
दिलनशीं! 

भी तो हो सकती थी!

12 comments:

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

दर्द को तू ज़ुबां देता क्यूं है?
कितना आसान है खामोशी से उसे बर्दाश्त करना,
अनकहे किस्सों को बयां देता क्यूं है?
किस्से गम-ओ- रुसवाई का सबब होते है|
ज़िन्दगी...
बच्चे की मुस्कान की तरह
बेसबब..और..दिलनशीं..भी तो हो सकती थी!
वाह...बहुत खूबसूरत...
ईद की मुबारकबाद कुबूल फ़रमाएं.

alka mishra said...

बहुत सुन्दर और कंटीली नज़्म है ये

आखिर क्यूं.....

ईद मुबारक तहे दिल से

विजय तिवारी " किसलय " said...

बहुत ही सुन्दर रचना है आपकी.
- विजय
दर्द को तू ज़ुबां देता क्यूं है?
कितना आसान है खामोशी से उसे बर्दाश्त करना,

vandan gupta said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति के प्रति मेरे भावों का समन्वय
कल (13/9/2010) के चर्चा मंच पर देखियेगा
और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूबसूरत

Majaal said...

मुश्किल ये है की जवाब पूछने भी उसकी के पास जाना पड़ेगा,और फिर वो जचाँ नहीं तो वापस भी नहीं आ सकते.. ये भी एक बेबसी है की यहीं गुजरा करना है ...
उम्दा अभिव्यक्ति ..

shama said...

Sun le aiye khuda ke,itni khoobsoorat dua ya iltija tujhse phir kaun karega?

vandan gupta said...

ज़िन्दगी!

बच्चे की मुस्कान की तरह

बेसबब!!

और
दिलनशीं!

भी तो हो सकती थी!
काश ऐसा हो पाता।

वन्दना अवस्थी दुबे said...

कितना आसान है खामोशी से उसे बर्दाश्त करना,
अनकहे किस्सों को बयां देता क्यूं है?
बहुत सुन्दर.

संजय @ मो सम कौन... said...

"ज़िन्दगी!

बच्चे की मुस्कान की तरह

बेसबब!!

और
दिलनशीं!

भी तो हो सकती थी!"

बहुत खूबसूरत अल्फ़ाज़।

रवि कुमार, रावतभाटा said...

सवाल उठाना...
जवाबों की राह में आगे बढ़ना है....
बेहतर.....

अरुणेश मिश्र said...

प्रशंसनीय ।