Tuesday, May 18, 2010

’छ्ज्जा और मुन्डेर’ "कविता' पर भी!




कई बार
शैतान बच्चे की तरह
हकीकत को गुलेल बना कर
उडा देता हूं,
तेरी यादों के परिंद
अपने ज़ेहन की,

मुन्डेरो से,

पर हर बार एक नये झुंड की
शक्ल में
आ जातीं हैं और
चहचहाती हैं


तेरी,यादें


और सच पूछो तो

अब उनकी आवाज़ें
टीस की मानिन्द चुभती सी लगने लगीं है।


मैं और मेरा मन
दोनो जानते हैं,
कि आती है
तेरी याद,
अब मुझे,ये अहसास दिलाने कि


तू नहीं है,न अपने


छ्ज्जे पर



और न मेरे आगोश में।

8 comments:

Unknown said...

सुन्दर अभिव्यक्ति......सच है मन रूपी मुण्डेर से यादों रूपी परिन्दे को उङाना बहुत मुश्किल है.....मानवीय जज्बातों की ये सुन्दर प्रस्तुति मन को कहीं भीतर तक संस्पर्श करती है......बधाई........कृपया मेरे ब्लॉग से जुङेगे तो खुशी होगी।

vandan gupta said...

वाह्……………गज़ब के भाव ,गज़ब का शब्द चयन,गज़ब की प्रस्तुति।

दिगम्बर नासवा said...

Lajawaab ... shabd nahi hain mere paas kuch kahne ko ...

वाणी गीत said...

यादें कहाँ जाती है किसी गुलेल से डर कर ...
डेरा डाले रखती हैं छज्जे पर मुंडेर पर ..!!

कडुवासच said...

...बहुत सुन्दर !!!

ktheLeo (कुश शर्मा) said...

शुक्रिया आप सब का पसंद करने के लिये,और शमा जी का इसे स्थान देने के लिये!

अरुणेश मिश्र said...

रचना सँवेदनाओँ को गहन भावभूमि प्रदायक है ।

वीरेंद्र सिंह said...

Shaandaar.......I went through it many times. Every time I feel to read it again. Thanks for such a nice poem.