Sunday, December 13, 2009

लुटेरे

हर बार लुट ने से पहेले सोंचा
अब लुट ने के लिए क्या है बचा?
कहीँ से खज़ाने निकलते गए !
मैं लुटाती रही ,लुटेरे लूट ते गए!
हैरान हूँ ,ये सब कैसे कब हुआ?
कहाँ थे मेरे होश जब ये हुआ?
अब कोई सुनवायी नही,
गरीबन !तेरे पास था क्या,
जो कहती है लूटा गया,
कहके ज़माना चल दिया !
मैं ठगी-सी रह गयी,
लुटेरा आगे निकल गया...

12 comments:

vandan gupta said...

waah.....bahut khoob

Unknown said...

haay haay haay .........

kalejaa nikal kar rakh diya aapne......

marmsparshi kavitaaon me aap ka koushal kamaal ka hai

bahut hi gahri kavita

abhinandan !

दिगम्बर नासवा said...

बहुत वेदना है आपकी रचना में ........... दर्द रिस रहा है ........

Yogesh Verma Swapn said...

wah,

koi lut gaya , koi loot gaya. dard se labrez rachna.

मनोज कुमार said...

रचना जीवन की अभिव्यक्ति है।

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

शमा साहिबा,

मैं लुटाती रही ,लुटेरे लूट ते गए!
हैरान हूँ ,ये सब कैसे कब हुआ?
.......
मैं ठगी-सी रह गयी,
लुटेरा आगे निकल गया...

गहन चिन्तन की यादगार पेशकश

बहुत खूब, मुबारकबाद

शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

वाणी गीत said...

ह्म्म्म....क्या लेकर आये थे ...क्या लेकर जायेंगे ....!!

वाणी गीत said...

ह्म्म्म....क्या लेकर आये थे ...क्या लेकर जायेंगे ....!!

संजय भास्‍कर said...

बहुत ही भावपूर्ण निशब्द कर देने वाली रचना . गहरे भाव.

Pushpendra Singh "Pushp" said...

बहुत ही अच्छा रचना
बहुत-२ आभार

रचना दीक्षित said...

कम शब्दों में काफी कुछ समेटे हुए एक मार्मिक और बेहतरीन रचना

Dr.R.Ramkumar said...

एक दर्द है जो पहचान में नहीं आता लेकिन साये की तरह लगा हुआ है। आपकी रचना पढ़कर जैसे वह कंधें पर आ बैठा।
ब्हुत अच्छी बात।