Friday, October 2, 2009

दो क्षणिकाएँ..

१)बहारों के लिए...

बहारों के लिए आँखे तरस गयीं,
खिज़ा है कि, जाती नही...
दिल करे दुआए रौशनी,
रात है कि ढलती नही...

२)शाख से बिछडा...

शाखसे बिछडा पत्ता हूँ कोई,
सुना हवा उड़ा ले गयी,
खोके मुझे क्या रोई डाली?
मुसाफिर बता, क्या वो रोई?

10 comments:

Chandan Kumar Jha said...

बहुत हीं सुन्दर क्षणिकायें । आभार

Yogesh Verma Swapn said...

sunder.

रश्मि प्रभा... said...

waah kya baat hai

vandan gupta said...

sundar gahan bahv.

Vinashaay sharma said...

नदी के दो कूल
मिलने को व्याकुल
कोई पथिक गया है विदेश
प्रेयसी का मिला नहीं सन्देश
अश्रुधारा लहरों मे मिल गयी
उसकी व्यथा नदी में घुल गयी

मेरे पुराने काव्य संग्रह से मेरी रचना

दिगम्बर नासवा said...

BAHOOT HI KHOOBSOORAT EHSAAS HAIN DONO RACHNAAYEN ......

ktheLeo (कुश शर्मा) said...

कमाल का लिख रहीं हैन आज कल आप! वाह के अलावा क्या कहा जा सकता है!

ज्योति सिंह said...

बहारों के लिए आँखे तरस गयीं,
खिज़ा है कि, जाती नही...
दिल करे दुआए रौशनी,
रात है कि ढलती नही...ati sundar .badhai ho .

ओम आर्य said...

शाख से पत्ते का बिछडना क्या मौसमे आती है और जाती है ........मौसमो के वाबजूद कभी कभी कोई कोई शाखे आभागी भी होती है ......

'sammu' said...

१-
खिज़ा बहार का एक सिलसिला तो जारी है
धूप और छाँव का यह खेल सब पे भारी है .
२-
हर पत्ते की बिछुडन पे रोती है सदा डाली
बतलाये क्या मुसाफिर पत्ता कहाँ से आया