Wednesday, July 1, 2009

वो महकी कली थी....

शबनम धुली थी,मेहकी कली थी,
पंखुडी नाज़ुक, खुलने लगी थी,
मनके द्वारोंपे दस्तक हुई थी,
वो चाहत किसीकी बनी थी!
शबनम धुली थी ....

बिछुड्नेवाली थी उसकी वो डाली,
जिसपे वो जन्मी,पली थी,
उसे कुछ खबरही नही थी,
पीकी दुनिया सजाने चली थी,
शबनम धुली थी.. ...

बेसख्ता वो झूमने लगी थी,
पुर ख़तर राहोंसे बेखबर थी
वो राह प्यारी, वो मनकी सहेली,
हाथ छुडाये जा रही थी,
शबनम धुली थी.....

कहता कोई उससे कि पड़ेगी,
सबसे जुदा,वो बेहद अकेली,
तो कली, सुननेवाली नही थी!
पलकोंमे ख्वाबोंकी झालर बुनी थी!
शबनम धुली, वो मेहकी कली थी,
वो सिर्फ़ मेहकी कली थी.....

"एक बार फिर दुविधा..",इस मालिका में इसे लिख चुकी हूँ...एक कड़ी की शुरुआत इस रचनासे की थी...

Tuesday, June 30, 2009

ताल्लुकात का सच!


मुझसे कह्ते तो सही ,जो रूठना था,
मुझे भी , झंझटों से छूटना था.

तमाम अक्स धुन्धले से नज़र आने लगे थे,
आईना था पुराना, टूटना था.

बात सीधी थी, मगर कह्ता मै कैसे,
कहता या न कहता, दिल तो टूटना था.

मैं लाया फूल ,तुम नाराज़ ही थे,
मैं लाता चांद, तुम्हें तो रूठना था.

याद तुमको अगर आती भी मेरी,
था दरिया का किनारा , छूटना था.

Thursday, June 25, 2009

भटकती हुई बदरी....

हूँ भटकती हुई बदरी,
अपनेही बंद आसमानोंकी,
मुझे बरसनेकी इजाज़त नही....

वैसे तो मुझमे, नीरभी नही,
बिजुरीभी नही,युगोंसे हूँ सूखी,
पीछे छुपा कोई चांदभी नही....

चाहत एक बूँद नूरकी,
सदियोंसे जो मिली नही....
हो गयी हूँ आदी अंधेरों की...

के हूँ भटकती हुई बदरी,
अपनेही बंद आसमानोंकी....
तमन्नाएँ रखूँ, लाज़िम नही....

शमा।

Tuesday, June 23, 2009

शमा"को ऐसे जला गए...

गुलोंसे गेसू सजाये थे,
दामनमे ख़ार छुपाये थे,
दामन ऐसा झटक गए,
तार,तार कर गए ,
गुल सब मुरझा गए...

पलकोंमे छुपाये दर्द थे,
होटोंपे हँसीके साये थे,
खोल दी आँखें तपाकसे,
हमें बे नक़ाब कर गए,
बालोंसे गुल गिरा गए.....

हम अपने गिरेबाँ में थे,
वो हर इकमे झाँकते थे,
बाहर किया अपने ही से
बेहयाका नाम दे गए,
गुल गिरके रो दिए....


वो तो मशहूर ही थे,
हमें सज़ाए शोहरत दे गए,
बेहद मशहूर कर गए,
लुटे तो हम गए,
इल्ज़ाम हमपे धर गए....

दर्द सरेआम हो गए,
चौराहेपे नीलाम हो गए,
आँखें बंद या खुली रखें,
पलकें तो वो झुका गए,
गेसूमे माटी भर गए...

बाज़ारके साथ हो लिए,
किस्सये-झूट कह गए,
अब किस शेहेरमे जाएँ?
हर चौखटके द्वार बंद हुए,
निशानों- राहेँ मिटा गए...

वो ये ना समझें,
हम अंधेरोंमे हैं,
उजाले तेज़ यूँ किए ,
साये भी छुप गए,
"शमाको" ऐसे,जला गए....

Sunday, June 21, 2009

दरख़्त ऊँचे थे...

तपती गरमीमे देखे थे,
अमलतास गुलमोहर
साथ खडे,पूरी बहारपे!
देखा कमाल कुदरत का,
घरकी छयामे खडे होके!
तपती गरमी मे देखे...

हम तो मुरझा गए थे
हल्की-सी किरण से!
बुलंद-ए हौसला कर के
खडे हुए धूप मे जाके!
तपती गरमी देखे...

दरख़्त खुदा के करिश्मे!
हम थे ज़मीं के ज़र्रे !
कैसे बराबरी हो उनसे ?
वो हमसे कितने ऊँचे थे!
तपती गरमी मे देखे...


आसमाँ छूती बाहों के,
साए शीतल, घनेरे,
कैसे भूँले,जिनके तले,
हम महफूज़ रह, पले थे!
तपती गरमी मे देखे थे...

Friday, June 19, 2009

मुकम्मल जहाँ ...

मैंने कब मुकम्मल जहाँ माँगा?
जानती हूँ नही मिलता!
मेरी जुस्तजू ना मुमकिन नहीं !
अरे, पैर रखनेको ज़मीं चाही
पूरी दुनिया तो नही माँगी?

मिली थी रौशनी,
नन्हें से जुगनूकी,
वो भी छीन ली
दिल भी जला लेती,
आँधियाँ वोभी बुझा गयीं...!

नाम की बस 'शम्म 'रह गयी,
अंधेरे दूर करनेकी चाहत थी,
तेरे नूर के रहते भी,
खुदाया! पूरी न हो सकी...


एक बगिया बनाएँ...

जब एक बूँद नूरकी,
भोलेसे चेहरे पे किसी,
धीरेसे है टपकती ,
दो पंखुडियाँ नाज़ुक-सी,
मुसकाती हैं होटोंकी,
वही तो कविता कहलाती!

क्यों हम उसे गुनगुनाते नही?
क्यों बाहोंमे झुलाते नही?
क्यों देते हैं घोंट गला?
करतें हैं गुनाह ऐसा?
जो काबिले माफी नही?
फाँसी के फँदेके सिवा इसकी,
दूसरी कोई सज़ा नही??

किससे छुपाते हैं ये करतूते,
अस्तित्व जिसका चराचर मे,
वो हमारा पालनहार,
वो हमारा सर्जनहार,
कुछभी छुपता है उससे??
देखता हजारों आँखों से!!
क्या सचमे हम समझ नही पाते?

आओ, एक बगीचा बनायें,
जिसमे ये नन्हीं कलियाँ खिलाएँ,
इन्हें स्नेह्से नेहलायें,
महकेगी जिससे ज़िंदगी हमारी,
महक उठेगी दुनियाँ सारी...
मत असमय चुन लेना,
इन्हें फूलने देना,
एक दिन आयेगा ऐसा,
जब नाज़ करोगे इन कलियोंका......"

2 टिप्पणियाँ:

mark rai ने कहा…

एक बगीचा बनायें,
जिसमे ये नन्हीं कलियाँ खिलाएँ,
इन्हें स्नेह्से नेहलायें......
beautiful thinking

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

इन्हें स्नेह्से नेहलायें,
महकेगी जिससे ज़िंदगी हमारी,
महक उठेगी दुनियाँ सारी...
Sunder.